हर रिश्ते में छुपा मेरे क्यों दर्द हैं
दर्द बना मेरा क्यों हमदर्द हैं
क्या मुझमे ही कोई कमी हैं
हर वक़्त आँखों में क्यों नमी हैं
काश! की याददाश्त ही खो देती
न रहती यादें न उन्हें याद करती
शायद वो जिंदगी बेहतर होती
रोज यादों से जुड़ती और मिटाती
न रहता कोई रिश्ता न कोई नाता
न मैं जाती न कोई मिलने आता
फिर कोई दर्द उठता मुझे क्या पता
दर्द के पास न अब मेरा कोई अता-पता
वक़्त के साए में मैं कहीं गुम हो जाती
दर्द बना मेरा क्यों हमदर्द हैं
क्या मुझमे ही कोई कमी हैं
हर वक़्त आँखों में क्यों नमी हैं
काश! की याददाश्त ही खो देती
न रहती यादें न उन्हें याद करती
शायद वो जिंदगी बेहतर होती
रोज यादों से जुड़ती और मिटाती
न रहता कोई रिश्ता न कोई नाता
न मैं जाती न कोई मिलने आता
फिर कोई दर्द उठता मुझे क्या पता
दर्द के पास न अब मेरा कोई अता-पता
वक़्त के साए में मैं कहीं गुम हो जाती
अपनों के सर से अपना बोझ कम कर जाती

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