Thursday, June 19, 2014

दुख-सुख, उतार-चढाव देखे सीता बन
हर तरह की जिन्दगी जी है औरत ने

कभी सुनीता तो कभी कल्पना बन
जमीं से आसमां की सैर की है औरत ने

बन झांसी की रानी और महताब
लडी है मैदान-ए-जंग औरत ने

कभी बन मदर टैरेसा भरे
औरों की जिन्दगी में रंग औरत ने

बेटी, बहू, बहन, सास, मां बन
ना-जाने कितने रिश्ते निभाए औरत ने

परिवार की खुशी के लिए
आपने अरमानों के गले दबाए औरत ने

जिन्दगी के बहुत से फलसफे
दुनिया वालों पढ़ी है औरत

फिर भी ना जाने क्यों
चुप, उदास, लाचार खड़ी है औरत

समझ नहीं आता फिर
औरत की दुश्मन ही क्यों बनी है औरत

=unknown


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